आज की शाम भी ढलने को है (कविता)

आज की शाम भी ढलने को है (कविता)

आज की शाम भी ढलने को है (कविता)


आज की शाम भी ढलने को है 
और तुम ना आए अभी तलक 
दिन तो निकल जाता है तेरी यादों में 
और शामे तुझे तलाशती है सन्नाटो में 
कई दिनों से लगता है तू आने वाला है 
अब तो तेरा वो खत रुलाने वाला है 

आज की शाम भी ढलने को है 
और तुम ना आए अभी तलक 
तेरी यादें  मुझमे समाती जाती  है 
और मेरे रूह की कसक मुझे खाये जाती है  
तुझे तलाशती हूँ मैं अपनी करवटो में 
जागने पर दिल रुदल जाता है सिलवटों में 


आज की शाम भी ढलने को है 
और तुम ना आए अभी तलक 
आज की शाम भी ढलने को है 
और तुम ना आए अभी तलक.......... 

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धन्यवाद 
हिमांशु उपाध्याय (HIM )
आज की शाम भी ढलने को है (कविता)


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