क्या लिखूं

क्या लिखूं 


क्या लिखूं क्या बतलाऊँ ये समझ नहीं आता 
कोशिशे लाख करता हूँ कुछ हासिल नहीं आता 
बिखरा  है जिंदगी का ढांचा संभालना नहीं आता 
अपनों के लिए दुसरो को रुलाना नहीं आता 
सताती है जिंदगी बेशक इस इस कदर 
पर हौसलों की उड़ानों को डुबाना नहीं आता 
क्या लिखूं क्या बतलाऊँ  ये समझ नहीं आता 



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