दर्द

दर्द 

दर्द का तो मानो उसके  साथ जन्मो का नाता हो चूका  है ।  उसका दर्द उसके लिए एक कालकोठरी बन है । 
अब तो उसको दर्द की लत लग जानी चाहिए।  वैसे तो  दर्द दुनिया के हर एक इंसान को है बस फर्क उसी को पड़ता है जो उस दर्द को झेलता है।  ये उस औरत  के दर्द की कहानी है जो ना तो इस दर्द की परेशानी  को जनती  था और ना ही दर्द की परिभाषा को ही जनती  था। 
कुमार, हां कुमार नाम ही दिया था पंडित जी ने उसके जन्म संस्कार के समय पर ये कोई ना जनता था की ये कुमार कुछ ही दिनों का मेहमान है उनके यहाँ। 
कुमार लगभग एक साल का ही पूरा हुवा था तो उसके चाचा उसके लिए लकड़ी वाली गाड़ी ले आये, की हमारा कुमार इसे पकड़ कर जल्दी चलने लगेगा।  और हुवा भी वैसा ही कुमार के तो मनो वो लकड़ी की गाड़ी पा कर पंख लग गए थे।
  वो गाड़ी के साथ अपने नन्ने नन्ने कदमो से बड़ी तेजी से चलता था और कभी कभी गिर भी जाया करता था।  कुमार की सबसे अच्छी दोस्त वही गाड़ी थी।  
कुमार दिन भर अब चलना ही चाहता था। पूरा घर उसकी इस आदत से वाकिफ हो चुका  था, इसलिए घर के  किसी ना किसी की नजर कुमार पर होती  थी। 
एक दिन कुमार रोज की तरह खेल रहा था पर तभी कुमार बेहोश हो कर गिर गया। काम में मशगूल माँ ने काफी देर जब कुमार की आवाज ना सुनी तो उसने किचेन के अंदर से ही कुमार को आवाज लगाई। पर कुमार ना ही माँ के पास आया और ना ही उसने कुछ बोला।
  माँ ने सोचा की कोई कुमार को कमरे में ले गया होगा और वो फिर से अपने काम में मशगूल हो गई। 

इधर कुमार बेहोश पड़ा था।  माँ का काम पूरा होते ही जब किचेन से बाहर निकली तो कुमार को फर्श पर निचे लेटा हुवा देख माँ को लगा की कुमार खेलते खेलते मानो  सो गया है। 
 माँ बड़े प्यार से उसके पास आई और उसे गोद  में उठा लिया, पर  ये क्या कुमार तो नीला पड़  चुका  था।  कुमार, कुमार माँ ने दो तीन बार कुमार को आवाज दी।  पर कुमार तो बेहोश था माँ की पुकार वो सुन ही नहीं सकता था। 
 माँ कुमार को गोद  में लेकर घरवालों के पास भागी।  देखिये न पापा जी कुमार को क्या हो गया कुमार आँख ही नहीं खोल रहा है , माँ ने बदहवास हो कर कहा।
  पूरा कमरा कुमार कुमार की आवाज से भर गया। कुमार के दादा जी ने तुरंत कुमार के पापा को फ़ोन किया और अस्पताल पहुंचने के लिए कहा।  घर के सभी लोग कुमार को अस्पताल लेकर पहुंचे। 
 डॉक्टर ने चेक कर के बताया की कुमार के दिल में एक छोटा छेद है, हमारे पास समय बहुत कम है इसका ऑपरेशन करना पड़ेगा। यह सुन कर  कुमार की माँ के तो कदमो तले जमीन  ही खिसक गई थी। 
वो बेसुध होकर वहीँ गिर पड़ी। तब तक कुमार के पापा भी अस्पताल आ चुके थे।  उन्होंने डॉक्टर को ऑपरेशन के लिए हामी  भर दी। 
 समय काफी निकल चूका था डॉक्टर के ऑपरेशन करने से पहले ही कुमार इस दुनिया को छोङ कर  जा चूका था। दादा जी के बुढ़ापे की लाठी, पापा की आँखों का तारा, माँ की तो पूरी दुनिया ही ख़त्म हो चली थी। 

आज इस दर्द को चार साल बीत चुके हैं पर ये दर्द जाता ही नहीं।  कुमार की माँ को आज भी कुमार के लौट आने की उम्मीद लगी रहती है।  

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हिमांशु उपाधयाय 


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