काशी की एक शाम


काशी की एक शाम 
काशी।
 काशी का नाम आते ही याद आती है वो कहीं दूर से आती हुई  भजनों  की मधुर आवाज और माँ गंगा की हवा की तरह बहती हुई जल की धारा की वो मनममोहक कोमल कल कल करती आवाज  जो मन को मोहने के लिए काफी है किसी  लिए भी।
काशी।
काशी उत्तर प्रदेश का एक ऐसा शहर है जो की अपनी अलौकिकता के लिए माना जाता है।  काशी दुनिया का सबसे पुराना शहर भी माना जाता है।  अगर ये कहा जाये की भारत की संस्कृति और सांस्कतिक उद्गम इसी नगर से हुआ है तो ये गलत नहीं होगा।  इस नगर में कई अलग अलग देशो के लोगो का आना और जाना लगा रहता है।  मुझे भी एक बार इस नगर में जाने और रुकने का मौका मिला।  इस नगर को शायद कोई पूरी तरह नहीं समझ सकता।
में रात करीब ८ बजे काशी स्टेशन पर ट्रैन से पहुंचा और एक होटल में रूम ले कर खाने की तलाश में निकल पड़ा कुछ दूर जाते ही मुझे एक अच्चा ढाबा मिला और मैंने खाना खाया।  ढाबे का मालिक बहुत ही अच्छा था मैंने बातो ही बातो में उससे पूछा की काशी में घूमने के लिए कौन कौन सी जगह है जो की मैं आसानी से घूम सकता हूँ। इस पर ढाबे का मालिक हस पड़ा और बोला शायद आप पहली बार  काशी आएं है इसीलिए ऐसी बात बोल रहे है वो बोले  साहब काशी तो दर्शन की जगह है आप जहाँ जहाँ जायेंगे वहां नये दर्शन पाएंगे।  मुझे उसकी बात सुन काशी की महत्त्व का कुछ अंदाजा जरूर हो गया था।  इसके बाद में अपने रूम के निकला उस मालिक से विदा लेके।  मुझे सुबह कहाँ जाना है इस बात का मुझे कुछ भी अंदाजा नहीं था पर उस ढाबे के मालिक की बताई हुई बातो से मेरे मन में एक अलग की छवि बनने लगी थी।  घर पर बात करते करते में सो गया और सुबह उठ कर नहाने चला गया।  जिस काम के लिए में काशी गया था उस काम को मेने जल्दी से निपटा कर निकल गया काशी में कुछ तलाशने।  क्या तलाशना था ये तो अभी भी मुझे नहीं पता था पर एक अलग सी ऊर्जा मुझमें समा गई थी मुझे ऐसा लग रहा था।  किसी तरह पूछते पूछते मैं BHU गया तो आखे फटी की फटी रह गई।  BHU का तो कोई ओर छोर ही नहीं पता चल प रहा था।  BHU के एक तरह से दर्शन के बाद मैं गंगा जी के दर्शन के लिए निकला जो की कुछ दुरी पर थीं।  समय की कमी के चलते मुझे जल्दी से जल्दी घूमना था।  मैं दशाश्वमेध घाट पर जा कर बैठ गयाऔर गंगा जी के दर्शन करने लगा। जब मैं घाट पर गया था तो ज्यादा भीड़ नहीं थी इसलिए मझे सब सामान्य लग रहा था पर जैसे जैसे समय बीतता गया भीड़ बढ़ते बढ़ते इतनी हो गई की उस घाट पर तिल रखने की नहीं बची। फिर सुरु हुवा मनमोहक दृश्य गंगा आरती का। गंगा आरती का वो नजारा मेरी आँखों में आज भी पूरी तरह से उसी रूप में है जैसा मेने उस समय देखा था। वो एक साथ पुजारियों का आरती को घुमन एक साथ पूजा करना एक साथ मंत्रो का उच्चारण करना ये सब देख के में मंत्र मुग्ध हो गया। हजारो लोगो की भीड़ ये सब एक साथ अपनी आँखों में समेत रहीं थी। वो नजारा मुझे आप भी याद है और पूरी जिंदगी याद रहेगा। गंगा आरती खेताम होने के बाद में अपने रूम में आया और ट्रैन पकड़ने के लिए स्टेशन के लिए निकल पड़ा. . .......

हिमांशु ये थी मेरी काशी की एक शाम की कहानी
अच्छी लगी हो तो कमेंट करके जरूर बताइयेगा।
धन्यवाद

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